हम अपने बुजुर्गों से सुनते आये हैं कि हमारा वक़्त बहुत अच्छा था। बड़ों का कहा पत्थर की लकीर होता था। हम अपने माँ बाप का बहुत ख्याल रखते थे।उनका आदर सम्मान हमारे जीवन का ध्येय होता था। सभी मिलजुल कर रहते थे। खेत या काम से घर लौटकर सबसे पहले अपने माँ-बाप का हालचाल जानते और उनसे पूछते कि बाबूजी आज का दिन कैसा रहा। उन्हें भी इंतज़ार रहता। कभी लेट हो जाते तो उतावले हो जाते। उस वक़्त मोबाइल नहीं था जिस पर सूचना दी जा सकती। आपसी व आस- पड़ोस से संबंध पक्के थे। हॉ ,कुछ ही घरों में लैंडलाइन फ़ोन होते थे। उसकी शान ही अलग होती थी। अधिकांश पड़ोसियों ने उन के नम्बर दिए होते थे अपने अपने जानने वालों को। आज की पीढ़ी को तो पता भी नहीं होगा कि PPनंबर क्या होता है, और इस नंबर को कुछ लोग तो अपने विवाह शादी के कार्ड पर भी छपा देते। इसका पड़ोसी लोग बुरा भी नहीं मानते थे और यहाँ तक कि वक्त-बेवक़्त आकर फ़ोन की सूचना भी दे देते थे। तब फ़ोन भी यदि आवश्यक सूचना हो, तभी आते थे। अतः फ़ोन आने पर सारे घर का परिदृश्य ही बदल जाता था; क्यों आया होगा; किस का होगा; शुभ सन्देश है या अशुभ।
खैर वक़्त बदला – वो ज़माना चिठ्ठी, टेलिग्राम, मनीआर्डर,रेडियो,रसालों व अख़बार का था। फिर टेलीविज़न का जमाना आया। लैंडलाइन फोन की तरह टीवी भी चुनिंदा घरों में ही होता था; पड़ोसी के घर जाकर दूरदर्शन पर चित्रहार, फ़िल्म व बाद में रामायण-महाभारत देखने का मज़ा भी अलग ही था। घर पर अगर किसी रिश्तेदार या जान पहचान वाले का ख़त आ जाता तो बहुत ख़ुशी मिलती। चिट्ठी पर अगर हल्दी का छिड़काव दिखाई देता तो वो विवाह या परिवार में नये सदस्य के आगमन का सूचक था। तार आने पर तो बस अक्सर एक ही शंका होती की कोई नाता-रिश्तेदार चल बसा संसार से।
रसोई घर में चुल्हे में ज्यादा समय आग जलती रहती थी जहाँ सभी एक साथ बैठकर खाना खाते या बतियाते थे। खाना आज की तरह पूछ कर नहीं परन्तु प्रायः अधिक ही बनता था, क्योंकि पता नहीं कब कोई ‘अतिथि’ भूले-भटके आ धमके।
फिर पैसे के आने पर घरों में डाइनिंग टेबल की अवधारणा शुरू हुई। रसोई से उठकर डाइनिंग टेबल पर खाना शुरू हुआ। धीरे- धीरे यह भी प्रथा समाप्त हो गई। अब तो अधिकांश घरों में डाइनिंग टेबल बाज़ार से आने वाले सामान को रखने की जगह बन गई है। जब कोई ख़ास मेहमान घर पर आता है तो इसे ठीक कर व साफ़ कर वहाँ खाना खाया जाता है। रसोई से डाइनिंग टेबल पर आए और अब सभी खाना अपने -अपने कमरों में मोबाइल या टेली- विजन के सामने बैठकर खाना पसंद करते हैं। जब खाना साथ खाते थे ,तो परिवार भी साथ-साथ रहते थे लेकिन जब से अपना अपना खाना और अपने अपने नखरे हो गए, तब से परिवारों में विघटन भी जल्दी शुरू हो गया। अब तो पूछ कर चपाती बनती है। खाना घर पर कम बनता है, बाज़ार से पसंदीदा खाना अधिक मंगवाया जाता है।
उस वक़्त पैसे कम थे ,पर संतोष अधिक था। हर मौसम में मेहमानों का आना-जाना लगा रहता था। अपने भाई बहनों के अलावा रिश्तेदारों के बच्चे भी साथ रहते थे। पढ़ाई थी ,पर पढ़ाई का दबाव नहीं था। हर साल नई किताबें ना खरीद कर बड़े भाई-बहन की किताबें ही पढ़ते थे या पड़ोस में पढ़ने वाले बच्चों से किताबें लेने का रिवाज था। उस समय की पीढ़ी मेहनत कर कुछ हासिल करना चाहती थी । अब जमाना ट्यूशन और cut-throat कम्पीटिशन का है। पहले गाँव से शहर आने व कुछ बनने की ललक होती थी; दिखावा नहीं था। पहले अध्यापक, गुरु जी कहलाते थे अब टीचर: सर और मैडम हो गए। समय के साथ सब कुछ बदलता गया; अब न स्कूल में और न ही घर पर मार पड़ती है। तब ‘भय बिन प्रीत कहाँ’ की कहावत थी। अब बुजुर्ग माँ-बाप साथ नहीं रहते, यदि रहते हैं तो अपने कमरे में! एक छत के नीचे सब के अपने-अपने कमरे व अटैच्ड बाथरूम । घर- घर नहीं लगता, मधु मक्खियों का छत्ता लगता है। सब नामालूम क्यों अपने-अपने काम में व्यस्त नज़र आते हैं। घरों में पैसा खूब है लेकिन शहद की तरह खाएगा कौन ये कोई नहीं जानता। मेरा अपने दोस्त राकेश कालरा के घर आना जाना लगा रहता था। जब भी हम जाते और अंकल जी से पूछते अंकल जी कैसे हो तो सदा एक ही जवाब मिलता “कल से अच्छा!” उस वक़्त तो ये बात समझ में नहीं आई और हमने भी इसे हँसी में उड़ा दिया। शायद हम तब अंकल जी की सोच को समझ नहीं पाए। लेकिन जैसे-जैसे हम भी बुढ़ापे की दहलीज़ पर पहुँचे तो मालूम हुआ कि समय तो वही अच्छा है जो वर्तमान है। उन्होंने हर दिन को अच्छे से जिया ।उनकी इसी सोच ने उन्हें दीर्घायु प्रदान की।
आज अंकल जी हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनके शब्द अब भी याद आते हैं कि- मैं कल से अच्छा हूँ।
अब मोबाइल का जमाना है। मोबाइल साथ लेकर चलना उसके साथ सोना लाज़मी हो गया है। मोबाइल छूट गया मानो सब कुछ छूट गया। हमारे ज़माने में अंगुठा लगाने बाला निरक्षर कहलाता था। वर्तमान में अँगूठा लगाने बाला पढ़ा लिखा हो गया है।
आज मुझे, बचपन में हम जिन्हें राजा जी कहते थे, के पास बाल कटवाने का मौक़ा मिला। यह शहर-गाँव का वह स्थान होता है जहाँ सूचना तंत्र के अलावा क़स्बे की सारी जानकारियाँ मिल जाती हैं। बस आपकी बात शुरु करने की देरी है, उसकी कैंची और जुबाँ एक साथ चलने लगती है। आज भी ऐसा ही कुछ हुआ जब मैंने पूछा कि कैसे हो क्या चल रहा है; उसने फटाक से कहा भाई जी समय बहुत ख़राब है; घोर कलयुग है; हर कोई बर्बाद है। तो मैंने पूछ लिया, क्या हुआ! भाई बोला – “कोई सुनता ही नहीं, ना बच्चे मॉ-बाप की, और तो और पति व पत्नी का भी यही हाल है।” लेकिन हम भी अपने माँ -बाप कहाँ सुनते हैं।
ज़माना बहुत आगे निकल गया है। इस सब की जड़ है मोबाइल। आदमी सोचता है मुझे किसी की ज़रूरत नहीं। सबके हाथ में पैसा व मोबाइल है। पैसा व मोबाइल सब काम कर सकता है। इसमें पैसे भी है। क्या बोलूँ इसमें हर तरह का नशा भी है। इसमें अच्छाई-बुराई दोनों हैं, और बहुमुल्य जानकारी भी; इसमें दोस्त भी है और दुश्मन भी। इसमें अलग ही संसार बसता है जिसकी कल्पना हमने कभी नहीं की थी। बाबूजी, बोलने की बात नहीं है अब तो मोबाइल उठाओ और सब कुछ जान जाओ। मोबाइल ने बहुत चीज़ें समाप्त कर दी हैं। मैं और मेरा मोबाइल ही सब कुछ रह गया है।आने वाला वक़्त कैसा होगा इसकी तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते लेकिन मैंने सुना है की मोबाइल में जो नया आ रहा है उससे तो आदमी को सोचने की भी ज़रूरत नहीं पड़ेगी वो उसकी सोचने की शक्ति को भी ख़त्म कर देगा। अपनी आई(माँ)से संवाद व सलाह नहीं लेंगे बल्कि मोबाइल की AI-आई से जरूर पूछेंगे। इस बातचीत में कब मेरे बाल कट गए मुझे पता भी नहीं चला। मैंने कहा भाई मोबाइल तो सब कुछ कर सकता है लेकिन मेरे बाल नहीं काट सकता। जो आप शिद्दत से काट रहे हैं। राजा जी तो राजा जी निकले- तपाक से कहा – भाई जी हम भी कुछ सालों में बेकार हो जाएँगे- रोबोट जो आ रहा है। उस में सिर फँसाया; बोला और बाल कट गए। मैं सोचने पर मजबूर हो गया कि राजा जी तो समय से आगे है। बटुआ निकाल कर जब मैं पैसे देने लगा तो ,राजा जी ने कहा- आप गुगल नहीं करते क्या? मेरे न जी कहने पर बोले साहब ,आप भी पुराने जमाने के रह गये। हमारा जमाना तो मोबाइल का है जी। तभी मेरा मोबाइल बज उठा और मैं कान से लगा कर दुकान से बाहर यह सोचते हुए निकला की जब रोबोट बाल काटेगा तो समाज का हाल कौन सुनाएगा। बुजुर्गों का वक़्त अच्छा था- राजा जी का- या आने वाला- रोबोट का?