हिमालय क्षेत्र में छोटी-छोटी रियासतों में बँटे इस भूभाग को एकत्रित कर हिमाचल का उदय आज़ादी के आठ माह उपरांत 15 अप्रैल 1948 को हुआ। एक नवंबर ,1966 में हिमाचल प्रदेश में पंजाब के पहाड़ी क्षेत्रों के विलय से विशाल हिमाचल बना।तदोपरांत डॉ. यशवंत सिंह परमार के नेतृत्व में राज्य को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलवाने के लिए एक संघर्ष आरंभ हुआ । पाँच जुलाई 1965 को कांग्रेस कार्यकारी समिति ने एक प्रस्ताव पास कर प्रदेश को संवैधानिक दर्जा ,लौह पुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल द्वारा 18 मार्च 1948 में लिखें पत्र का हवाला देते हुए पारित किया ,जिसमें सरदार पटेल ने लिखा था की – “अपने अंतिम चरण में जब यह क्षेत्र अपने संसाधनों तथा प्रशासनिक प्रशासनिक तौर पर पूरी तरह से विकसित हो जाएगा तो यह संवैधानिक तौर पर देश के अन्य राज्यों के समान होगा। “ सरदार वल्लभभाई पटेल का यह कथन हिमाचल को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने का आधार बना । वहीं नेहरु-गांधी परिवार की विशेष अनुकंपा ने भी अहम योगदान दिया।
इसी कड़ी में 24 जनवरी 1968 को हिमाचल प्रदेश विधानसभा सभा ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित किया ,जिसमें कहा गया कि अब समय आ गया है कि हिमाचल प्रदेश को पूर्ण राज्यत्व का दर्जा प्रदान किया जाए ।इस दर्जे के लिए डॉ परमार के नेतृत्व में केंद्रीय नेतृत्व ,केंद्र सरकार से इस माँग को पुरज़ोर से उठाया गया की -प्रदेश को पूर्ण राज्य का दर्जा देने के लिए बिना समय गंवाए आवश्यक विधेयक पारित किया जाए। इसके अतिरिक्त प्रदेश के नेतृत्व ने केंद्र के साथ इस मसले पर बातचीत को बढ़ाने के लिए एक समिति का भी गठन किया ।राज्य सभा तथा लोक सभा में प्रदेश की इस माँग के लिए निजी सदस्य प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान ,राज्य की इस माँग पर सभी सांसदों का पूर्ण सहयोग मिला ।राज्य के प्रयास फलीभूत हुए ।31 जुलाई,1970 को हिमाचल प्रदेश को पूर्ण राज्यत्व का दर्जा प्रदान करने के लिए लोक सभा व राज्य सभा में एक विधेयक लाया गया। चर्चा के दौरान इस विधेयक पर कांग्रेस पार्टी के इलावा अन्य दलों के सदस्यों ने भी अपनी सहमति व्यक्त की । 18 दिसंबर 1970 को लोक सभा ने इस विधेयक को पारित किया ।
हिमाचल के इतिहास में तीन तारीखें 15अप्रैल , एक नवंबर और 25 जनवरी प्रमुख है ।15 अप्रैल ,1948 को 31 छोटी -बड़ी रियासतों का विलय कर, हिमाचल का गठन हुआ , एक नवंबर को विशाल हिमाचल जबकि 25 जनवरी 1971 को हिमाचल को पूर्ण राज्यत्व का दर्जा मिला ।आज की पीढ़ी को तो हिमाचल दिवस व पूर्ण राज्यत्व दिवस में अंतर भी मालूम नहीं है ।वही नौकरीपेशे वालों को तो इन दिनों की सिर्फ़ छुट्टी तक ही याद रहती है। अगर ये तारीख़ अवकाश वाले दिन आ जाये ,जैसा की इस बार 25 जनवरी, 2026 को रविवार है तो कर्मचारी को अफ़सोस ही होता है की कि एक छुट्टी मारी गई। सेवानिवृत्ति कर्मी तो बैसे ही खुश हो जाता है।
*बर्फ व 25 जनवरी *
चलो इतिहास की सुई को पीछे घुमाते है-हिमाचल के गौरवशाली इतिहास में 25 जनवरी,1971 का उस वक़्त सुनहरा पन्ना जुड़ा जब, शिमला के ऐतिहासिक रिज मैदान पर तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने भारी बर्फ़बारी के मध्य उपस्थित अपार जनसमूह के समक्ष हिमाचल प्रदेश को देश का 18वाँ राज्य बनाने की घोषणा की ।इस उपलब्धि को हासिल करने में हिमाचल निर्माता व प्रथम मुख्यमंत्री डॉक्टर यशवंत सिंह परमार व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की अहम भूमिका रही ।उन्हीं के अथक प्रयासों से हिमाचल प्रदेश अपनी ज़रूरतों व लोगों की आशाओं और आकांक्षाओं के अनुरूप प्रगति पथ पर आगे बढ़ने में कामयाब हुआ ।
*गठन से व्यवस्था परिवर्तन तक का सफ़र *
हिमाचल प्रदेश ने इन दशकों में विकास के अनेक कीर्तिमान स्थापित किए हैं। पगडंडियाँ से पथ निर्माण ;चौपाया से चार पहिया ;अंधकार से उजाले ;चुहलें से गैस स्टोब; बावड़ी से नल;फाँके से पेट भरने ; निरक्षर से अक्षर ज्ञान ; कोदे से सेब ;जड़ी बूटियों से रोबोट चिकित्सा ; फ़ाईल से आनलाइन पद्धति प्रमुख मील पत्थर हासिल किए हैं। वर्ष 1948 में पहाड़ी प्रदेश के बनने से लेकर वर्तमान में व्यवस्था परिवर्तन का दौर यहाँ की जनता ने देखा है और देख भी रहे हैं।
आरम्भिक वर्षों में तो यहां के राजनीतिज्ञों ने प्रदेश के बारे में सोचा व काम भी किया ,जो किसी से छिपा नहीं है ।
*राजनीति में बदलाव *
20वीं सदी के अंतिम दशक के आते-आते विकास क्षेत्रवाद, भाई भतीजावाद व परिवारवाद की भेंट चढ़ गया। तो आज ये अपनी चरम सीमा पर है । नेताओं व अधिकारियों की मिलीभगत से हिमाचल शर्मसार हुआ है। राजनेताओं व अधिकारियों के आलिशान दफ़्तरों, घरों व वाहनों को देख कर नहीं लगता की राज्य कठिन वित्तीय संकट के दौर से गुज़र रहा है । विकास में पैसे की कमी की दुहाई दी जाती है ,जबकि अपने लिए ऐशो आराम की सभी सुविधाएँ हैं ।जहाँ कभी नेता पैदल ,मीलों चल आम जनता का हाल जानते थे उनका दुख दर्द समझते थे ।अब आम जन के पैसे पर “पुष्पक विमान “ व आलीशान गाड़ियों में उड़ते व घुमते हैं । पुरानी पीढ़ी को तो याद होगा कि एक कार्यकाल में राज्य की अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने के प्रयास भी किया गये,लेकिन भीड़ तंत्र ने उन्हें नकार दिया। खोओ और मौज उड़ाने का बोलबाला है ।एक बात कभी समझ में न आई की सरकारी कार्य क्रम व बैठकों का आयोजन होटलों में क्यों किया जाता है? लोकतंत्र में राजनीति भी राज शाही की तरह चल रही लगती है ।दरबार रोज सजता है ,जनता फरियाद लेकर आती हैं। नेताओं की सभाओं में पहले लोग उनके विचार सुने जाते थे लेकिन अब सभाओं में अंध-भक्त व वही लोग उपस्थित होते हैं जिनकी मजबूरी होती है या जिन्हें कुछ न कुछ पाने की दरकार रहती है। आज की युवा पीढ़ी तो राज नेताओं की शक्ल तक नहीं देखना चाहतीं ,उस भीड़ का हिस्सा भी नहीं बनना चाहती है,जिसमें बड़े-बड़े आश्वासन व हाँका जाता है और काम कुछ भी नहीं होता ।
अभी कुछ दिनों पहले मेरे साथी भाई कृष्ण जी ने फ़ेसबुक पर एक वीडियो शेयर किया। जिस में नीदरलैंड्स के प्रधानमंत्री अपने 14 साल के कार्यकाल के अंतिम दिन कार्यालय से निकल कर अपनी साइकिल पर घर की ओर चल दिए। इतने वर्षों में न भ्रष्टाचार न दिखावा ।मैं सोचता हूँ हमारे देश में ऐसा वीडियो कब देखने को मिलेगा। डॉ परमार जब पद छोड़ कर अगले दिन सरकारी बस में बैठे कर अपने गाँव की ओर निकल पड़े ,काश उस दिन वीडियो बनाने वाला कोई होता। नीदरलैंड्स की तरह वह भी वायरल होता ?हमारे प्रदेश में आज एक छोटा कर्मचारी भी सेवानिवृत्त होने पर लाखों रुपये खर्च कर देता है।राजनेताओं के अपने तथा बच्चों के विवाह तक सुर्ख़ियाँ बनती हैं।
अगर उद्घाटनों , सरकारी भोज, सरकारी वाहनों पर पूर्ण प्रतिबंध लग जाए तो न ऋण लेना पड़ेगा और विकास भी संभव होगा । नेता व अधिकारी का कार्यालय आना वापिस जाना उस की अपनी ज़िम्मेदारी होनी चाहिये न की सरकार को उसे व उसके परिवार को ढोने की ज़िम्मेदारी होनी चाहिए ।इन प्रयासों से अवश्य ही रोज़गार के अवसर भी बढ़ेंगे । किसी विकसित देश में हमने नेताओं द्वारा उद्घाटन की ख़बरें न ही सुनी व देखी हैं।
*डॉक्टर परमार व हिमाचल*
एक रोज़ मुझे ,मेरे मित्र विवेक मोहन जी का फ़ोन आया की भाई सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग में लम्बी नौकरी की है-क्या आप को उस जीप का नम्बर याद है ,जिसमें इंदिरा गांधी , तत्कालीन गवर्नर व परमार अनाडेल से रिज मैदान तक 25 जनवरी 1971 को आये थे । मैंने भी अपना ख़ज़ाना खोला और तुरंत भाई को जानकारी दी-HIL-3908 , उस दिन से मेरे ज़हन में जीप घूम रही थी। चलो वक़्त आ ही गया कि जीप में सवार डॉ परमार की बात की जाए। अब जीप में कोई सवार नहीं होता सब महंगी कारों में सवार होकर जाना चाहते हैं।
*त्याग भरी राजनीति *
डॉक्टर परमार का उदाहरण सभी के सामने है कि उन्होंने जब यह देखा कि अब राजनीति उनके बस की नहीं है ,तो उन्होंने राजनीति को बिना किसी की सलाह लिए छोड़ दिया। अंतिम साँस तक शान से एक साधारण व्यक्ति की तरह अपना जीवन जिया ।ऐसे महान व्यक्ति जिसने हिमाचल को बनाया और हिमाचल को शैशवकाल से विकास के पथ पर आगे बढ़ाया उसको मात्र उनकी जन्म तिथि व पुण्यतिथि पर ही याद किया जाता है। ऐसी शख़्सियत सदियों में एक बार आती है ,जिनके आने का विशेष मकसद होता है।आज सिरमौर में उनके घर की सड़क व घर को देख कर अंदाज़ा लगाया जा सकता है की वे अपने व परिवार के लिए नहीं बल्कि हिमाचल के लिए जिए।डॉक्टर परमार का सम्पूर्ण जीवन त्याग,समर्पण व निष्ठा से भरा हुआ था।
*बिजली गुल ने स्मरण करवाया 25 जनवरी का दिन *
प्रकृति का बस किसी पर नहीं चलता । आपदा के इस दौर में,यह मैंने 25 जनवरी 2026 को हिमाचल के पूर्ण राज्यत्व की पूर्व संध्या पर उस वक़्त लिखा जब अधिकांश शिमला एक छोटी सी बर्फ़बारी के कारण अंधकार में डूबा हुआ था ।गाँवों व देहात का हाल क्या होगा, इस का मुझे मालूम नहीं। मुझे स्मरण आया कि जिस दिन वर्ष 1971 में हिमाचल प्रदेश को पूर्ण राज्यत्व का दर्जा मिला था। उस दिन भी तो बर्फ़बारी हो रही थी। शायद तब भी शिमला में बिजली न हो। उस दिन मैंने शिमला में इतिहास बनते नहीं देखा था। इसीलिए आज भी शिमला व पहाड़ी क्षेत्र इसी ख़ुशी में अंधकार में डूबा हो। हमने तो उजाले में अपना जीवन का सफ़र आरंभ किया गया था, हमारे वक़्त में बिजली आ ही गई थी। लालटेन का दौर ख़त्म हो गया था। शायद बिजली गुल होने का यह अभिप्राय होगा की हम भी उन प्रदेश वासियों को याद कर सकें ,जिन्होंने कठिनाइयों व अंधकार में जीवन व्यतीत कर एक ख़ुशहाल हिमाचल का सपना संजोया था और कड़ाके की ठंड के बावजूद ऐतिहासिक पलों को निहारा था ।
Vinod Bhardwaj
Honouring the Past. Illuminating the Present.