आर्थिक संकट में हिमाचल सरकार के
नवाबी शौक!
हाल ही में हिमाचल के वित्त सचिव का ख़ुलासा कि ‘प्रदेश घोर आर्थिक संकट से गुज़र रहा है’, इस मुद्दे ने हर जगह एक बहस छेड़ दी है। हिमाचल के इतिहास में पहली दफ़ा हुआ जब एक उच्च अधिकारी ने वित्तीय संकट का ख़ुलासा किया। चाय से लेकर नाई की दुकान, कार्यालयों व राजनैतिक गलियारों तक सब इस मुद्दे पर चर्चा करते नज़र आ रहे हैं। जब सरकार राज्य की इस स्थिति से वाक़िफ़ थी तो वित्त सचिव की प्रेजेन्टेशन हास्यास्पद लगती है। राज्य की सरकार व सरकारी अमरबेलें आर्थिक स्थिति जानते हुए भी अपनी मौजमस्ती के लिए क़र्ज़ लेकर घी पीती रही हैं। सभी प्रदेशवासी सच्चाई जानते हैं लेकिन यहां के भोले भाले लोग कुछ बोलते नहीं हैं। तीन साल से सरकारी ख़ज़ाने पर ऐश कर रही सरकार व उनके मित्र-मंडली के अब जनता के सामने घड़ियाली आँसू क्यों निकले, यह विचारणीय प्रश्न है? मीडिया में दिए जा रहे बयानों से अभी आम जन-मानस को डराकर ऐसा माहौल बनाया जा रहा है कि सैलरी, पेंशन व डी ए बंद हो जाएगा। रोज़गार नहीं मिलेगा। लेकिन लोकतंत्र के राजाओं ; नेताओं व अधिकारियों की मिलीभगत से उनकी ऐश यथावत बनी रहेगी।
वर्तमान सरकार को राज्य की वित्तीय स्थिति का तो पदभार सँभालते ही पता चल गया था। तीन साल पहले मैंने एक अख़बार में लेख लिखा था- “उड़न खटोले में उड़ जाऊँ रे-हाथ किसी के न आऊँ रे।” इस में लोकतंत्र की राजसी ठाठ-बाट का ही उल्लेख किया गया था। अब सच सबके सामने है। आकाश मार्ग से चलने वाले आम जनता का दर्द क्या जानें।
वित्तीय स्थिति सुधारने के लिए अर्थशास्त्र के रचयिता चाणक्य से हम सभी को सीख लेनी चाहिए। मगध साम्राज्य का महामंत्री रहते भी वो सरकारी काम व निजी काम के लिए अलग-अलग ‘दीपक’ रखता था। एक का तेल सरकारी व दूसरे का निजी पैसे से आता था। इस का उल्लेख चीनी यात्री ह्वेनसांग ने किया है। अब सभी नेता व राजकाज से जुड़े लोग ‘सरकारी ख़ज़ाने का तेल’ लगाने की होड़ में नज़र आते हैं।
व्यवस्था परिवर्तन का नारा देने वालों के लिए ठोस सुझाव हैं, जो उन सभी साथियों के हैं, जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन विभिन्न क्षेत्रों में प्रदेश को विकसित और उन्नत बनाने में लगाया। ‘व्यवस्था परिवर्तन’ के लिए होर्डिंग पर बखान नहीं बल्कि हिम्मत, त्याग समर्पण और निष्ठा धरातल पर दिखनी चाहिए।
वित्तीय अनुशासन लाने के लिये फिजूलखर्ची पर रोक आवश्यक है:-
– हैलीकाप्टर सेवा पर प्रतिबंध लगे।
– इमरजेंसी में सेना व निजी कंपनी की सेवाएँ लेने का प्रावधान हो।
– वर्तमान सरकार में तैनात मित्रों की सेवा तत्काल प्रभाव से समाप्त करना।
– सेवा उपरांत कार्यरत अधिकारियों व कर्मचारियों को सेवाएँ तुरंत प्रभाव से समाप्त करना।
– भविष्य में सरकारी कार्यक्रम का आयोजन राजधानी में सचिवालय या सरकारी हाल में व जिला में सरकारी सभागृह में हो।
– सरकारी उद्घाटनों पर पूर्ण प्रतिबंध।
– सरकारी भोज पर रोक।
– सभी सरकारी अधिकारियों की गाड़ियों पर रोक लगा कर, उन्हें कार्यालय आने-जाने का ज़िम्मेदारी स्वयं लेनी होगी की अनिवार्यता।
-जब चिकित्सक, शिक्षक व क़ानून व्यवस्था वाले कर्मचारी अस्पताल व अपने कार्यालय स्वयं आ सकते हैं तो अधिकारी क्यों नहीं?
-राज्यपाल व मुख्यमंत्री व कैबिनेट मंत्रियों को मात्र दो गाड़ियों की अनुमति हो।
– नई महंगी गाड़ियों की खरीद पर रोक लगे।
– सभी सरकारी दफ़्तरों में निजी टैक्सी पर प्रतिबंध। अन्यथा इन का दुरुपयोग नेताओं व कर्मचारियों की बीवियों व रिश्तेदारों और समर्थकों के अलावा बच्चों को ढोने के लिए किया जाता रहेगा।
– सम्पूर्ण प्रदेश में निजी भवनों में चल रहे कार्यालय तुरंत प्रभाव से सरकारी भवनों में स्थानांतरित हों। जैसे राजधानी में बालूगंज में विश्व बैंक के पैसे से बनी बिल्डिंग, जो 80 प्रतिशत ख़ाली पड़ी हुई है का उपयोग। प्रदेश भर में नेताओं, अधिकारियों व रसूखदारों के निजी भवनों में कार्यालय चल रहे हैं।
– गुलदस्ते व उपहार पर प्रतिबंध लगे।
– विदेशी दौरों पर पूर्णतया प्रतिबंध व दिल्ली दौरे पर राजनीतिक बैठकों में शामिल होने के लिए पार्टी का खर्चा हो। मंत्रालय का दौरा दिखाकर राजनीतिक बैठकें में शामिल होने पर अपनी जेब से खर्च करने का प्रावधान। मुख्यमंत्री और मंत्रियों के दौरों के दौरान अवांछित एस्कॉर्ट्स और अन्य गाड़ियों की संख्या को कम से कम करना।
– एम्बुलेंस, अग्निशमन व आपदा वाहनों को छोड़कर, शुक्रवार शाम से सोमवार सुबह तक अन्य सभी सरकारी वाहनों के चलन पर रोक।
-सभी नेताओं व अधिकारियों की गाड़ियों की लोगबुक आनलाइन।
– सभी अधिकारियों व कर्मचारियों को टेलिफोन व मोबाइल व इंटरनेट भत्ते पर रोक।
– सरकारी आवास में रहने वाले मुख्यमंत्री से लेकर सभी मंत्रियों को किराया देना अनिवार्य हो। कोठी का किराया, बिजली-पानी और अन्य मुफ्त सुविधाओं को तर्कसंगत बनाकर लागू किया जाए।
– जिन कर्मचारियों या नेताओं का तैनाती बाले स्थान पर आवास हैं उन्हें सरकारी आवास नहीं देने का प्रावधान करना। पत्नी व बच्चों के नाम पर भी मकान होने पर सरकारी आवास अलॉट ना हो।
– राज्य भर में लगने वाले होर्डिंग व अख़बार में विज्ञापन पर रोक।
– सरकारी योजनाओं की जानकारी केवल वेबसाइट पर।
– कर्मचारियों का तीन साल तक एक ही स्थान पर काम करना अनिवार्य।
– सभी विकास कार्यों के लोकार्पण कार्यक्रम आनलाइन।
– निजी आयोजनों में शामिल होने पर मुख्यमंत्री से लेकर अधिकारियों को व्यय स्वयं करना। इन कार्यक्रमों में सरकारी गाड़ी लेकर जाने पर प्रतिबंध। हाल ही में एक नेता व अन्य नेता के बच्चें की शादी सुर्खियों में रही जब सारी सरकार, हैलीकाप्टर व सरकारी वाहनों में सवार होकर समारोह में शामिल हुई। सरकार को पाँच हज़ार का शगुन- पचास हज़ार से लेकर लाखों में पड़ा।
– सभी नेताओं व कर्मचारियों को कार्यालय से बाहर जाने का विवरण आधिकारिक वेबसाइट पर प्रतिदिन अपलोड करना अनिवार्य।
– सरकारी कर्मचारियों की कालोनी से सरकारी बस सेवा शुरू करने की व्यवस्था।
– जिला व राज्य स्तरीय आयोजन का ज़िम्मा निजी हाथों में देने की व्यवस्था। जिला प्रशासन के दख़ल पर प्रतिबंध। अन्यथा हिमाचल का सम्पूर्ण प्रशासन सालभर मेले व सांस्कृतिक आयोजनों में ही व्यस्त रहता है।
– धर्मशाला में स्थित विधानसभा परिसर को केंद्रीय विश्वविद्यालय खोलने के लिए हस्तांतरित किया जाना चाहिए। इस से हर वर्ष लाखों रुपए की बचत होगी।
उपरोक्त उपायों को अपनाने से जहाँ राज्य सरकार की वित्तीय स्थिति सुधरेगी वहीं कार्य संस्कृति को भी बढ़ावा मिलेगा। मेरा विश्वास कि इन उपायों से अर्थव्यवस्था मज़बूत होगी और रोज़गार के अवसर तो बढ़ेंगे ही, वहीं आधे से ज़्यादा मुफ़्तखोर, कामचोर, टायर्ड या रिटायर्ड घर पर बैठ जाएंगे। सरकारी वाहनों की संख्या में कमी से लोगों को शहरों व क़स्बों में वी.आई.पी. कल्चर से छुटकारा मिलेगा और अधिकतर शहरों की ट्रैफिक की समस्या से भी निजात मिलेगी। सरकार क़र्ज़ लेकर घी खरीद से भी बचेगी।
– अगर आप उपरोक्त सुझावों से सहमत हैं तो अपने विचार और सुझाव अवश्य प्रकट करें। चुप रहना भी जुर्म का साथ देने के समान है।
– धन्यवाद। जय हिमाचल![]()
Vinod Bhardwaj
Honouring the Past. Illuminating the Present.