शिमला ने अंग्रेज़ों से लेकर आज तक इतिहास को बनते व बदलते देखा है । यहां का मालरोड इसका गवाह व साक्षी रहा है। अंग्रेज़ों के ज़माने से माल पर चहलक़दमी करना और यहाँ के रेस्टोरेंट में बैठना और बतियाना शिमला शहर की संस्कृति व परम्परा का अहम हिस्सा रहा है ।हाल ही के वर्षों में शिमला के माल रोड का परिदृश्य तो कुछ बदला है लेकिन यहां के निवासियों का टहलना व रेस्टोरेंट में बैठना बिलकुल भी बदला नहीं है। नौकरी पेशे बाले तो अमूमन शाम को ही रेस्टोरेंट में बैठना पसंद करते हैं लेकिन हाल ही के वर्षों में शिमला रिटायर कर्मियों का शहर बन गया है । बालजीज रेस्टोरेंट के बंद होने के बाद सभी के मिलने का अड्डा शिमला का एल्फा , आशियाना या कॉफ़ी हाउस ही है। कॉफ़ी हाउस की सबसे बड़ी ख़ूबी है ,इसने शिमला वासियों व जनपद के निवासियों को वर्ष 1957 से कॉफ़ी का स्वाद चखाया ही नहीं बल्कि ये उनका पसंदीदा पेय बन गया वही संवाद का मुख्य केंद्र भी बना। रोज़ माल पर घूमने वालों में काफ़ी की लत इस कदर है कि कुछ वक़्त माल पर टहलने के बाद कदम काफ़ी हाउस की ओर स्वयं ही उठाते हैं।
बात कॉफ़ी हाउस की चली है तो यह प्रदेश ,देश व दुनिया की राजनीति पर होने बाली बहस का इसे “हाउस “कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी ।हर मुद्दे पर बहस सुनी व की जा सकती है। यहाँ सुबह से ही लोगों का सदन लग जाता है ।सबका अपना अपना वक़्त है ।कोई सुबह आता है ।कोई दोपहर में ।कोई शाम में आता है और कोई सूरज ढलने के बाद कॉफ़ी हाउस में दिखाई देता है ।सबके अपने अपने समूह है ।सबकी अपनी -अपनी विचारधारा है व मित्र मंडली ।सेवानिवृत्त कर्मचारियों व अधिकारियों के अपने अपने गुट व टोलियाँ हैं ।चाहे उन्होंने अपने समय के दौरान कुछ ना भी किया हो लेकिन कॉफ़ी हाउस की लोक सभा में उन्हें बड़ी -बड़ी बातें हांकते हुए सुना व देखा जा सकता है।
मैं ,यह प्रसंग इसलिए लिख रहा हूँ कि अब कॉफ़ी हाउस का एक साथी जिसके साथ हमारा भी लगभग 30 वर्षों का नाता रिश्ता रहा और वह हमारे परिवार का हिस्सा लगता था ,31 जनवरी 2026 को सेवानिवृत्त हो गया ।नाम था उसका भागीरथ और धीरे -धीरे वह अपने काम व स्वभाव से सभी का चहता बन गया ।उसकी पहचान-तुरें बाली सफेद पगड़ी ,सफेद पोशाक और सीने पर कॉफ़ी हाउस का एक नंबर बैच, कमर में चमकती बैलट,चेहरे पर मुस्कान थी ।जब भी कॉफ़ी हाउस में पहुँचते तो साहब ठीक हो ,फ़लाना टेबल ख़ाली है ।आज आपके साथ आपके साथी नहीं आए । फ़लाँ व्यक्ति तो सुबह ही आ गया था। साथी गाँव गए होंगे ।अगर किसी दिन अपने वक़्त से पहले आ गये,तो पूछ लेता,आज कुछ काम होगा ,जो जल्दी आ गए ।हम भी मुस्कुरा देते हैं और जब परिवार के साथ जाते तो उसका व्यवहार देखते ही बनता था ।

शिमला की एक बात ज़रूर है की कि माल पर रोज टहलने बालों की पहचान रेस्टोरेंट बालों से सबसे ज़्यादा होती हैं। सुबह जब कभी कभार भागीरथ काफ़ी हाउस के गेट पर मिलता ,तो राम-राम के बाद कहता-बैठों काफ़ी पी कर जाओ जी। इसकी वाणी में अपनत्व झलकता था जैसे कोई आदर से घर बुला रहा हो ।
उसे सभी के स्वाद का पता था ।कौन काली कॉफ़ी पीता है ,कौन नार्मल कॉफ़ी पीता है और जब कॉफ़ी का ऑर्डर दिया जाता तो कहता साहब कुछ खाओगे नहीं ,तो हम अक्सर बोलते ,चलो पकौड़े ले आओ या एक-एक ब्रेड पीस।
भागीरथ ने पृथ्वी पर गंगा लायी थी और वे अमर हो गये। शिमला कॉफ़ी हाउस के भागीरथ ने 40 वर्ष तक मेहनत व लगन से यहाँ आने वाले हज़ारों मेहमानों को कॉफ़ी रूपी गंगा हर टेबल तक पहुँचाई वह शहर का चेहरा व चेहता बन गया। चाहे लाल कृष्ण अडवानी हो,मोदी हो, वीरभद्र सिंह हो, धूमल हो ,जय राम हो या वर्तमान के मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू या देशी-विदेशी पर्यटक हो उसने सभी के साथ एक समान व्यवहार रखा और काफ़ी को नज़ाकत से परोसा।
मुझे याद है कि जब कोविड का वक़्त था ,तो उस वक़्त कॉफ़ी हाउस बंद था और कर्मचारियों को वेतन भी नहीं मिल रहा था ।पर जब कॉफ़ी हाउस खुला लोग वहाँ जाने से डरते थे ।तब मुझे भागीरथ भाई के दिल का हाल जानने का मौक़ा मिला ।उस कठिन वक़्त में भी उनके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी । आज भी याद है मुझे भागीरथ की वह बात “साहब बुरा वक़्त निकल जाएगा ;फिर अच्छे दिन भी आएँगे ;ये तो जीवन में चलता ही रहता है ;बस जीवन रहना चाहिए । शहरवासियों ने ग़रीबों की बहुत मदद की ।”उसकी बातों में दर्शन था व शिमला शहर के प्रति एक प्रेम व लाजवाब नज़रिया।
जब कॉफ़ी हाउस से बाहर निकालते या बिल देने का वक़्त आता तो भागीरथ प्यार से बोलता ,बैठो और कॉफ़ी पी लो अभी तो समय नहीं हुआ है ।उसके साथ सभी का नाता रिश्ता था कि जब आज कॉफ़ी हाउस में मित्रों के साथ जाने का मौक़ा मिला तो न राजनीति पर , न बजट पर और न देश व विदेश में चल रही राजनीति पर,न ही दुनिया की उथल पुथल ,सोना चाँदी के भाव पर बात हुई। शिमला का मौसम जो बिगड़ा था ,उस पर भी किसी का ध्यान न गया। यहां तक की ठंड भी नहीं लगी।
आज तो बस बात हुई भागीरथ पर। क्या व्यक्ति था क्या उसका व्यक्तित्व ।उसने,क्या शान से नौकरी की ।कभी उसे मायूस नहीं देखा ;कभी उसे उतावला नहीं देखा ।बस कानों में एक ही बात गूंजती रही ,बैठो साहब जी -कैसे हो -कॉफ़ी लाऊँ -अभी तो आपके साथी लोग नहीं आए ।रुक लो। आप से ज़्यादा उसे हमारे साथियों की याद रहती थी । सभी एक दूसरे को सोशल मीडिया पर भागीरथ के बारे में आई पोस्ट को दिखा व शेयर करते नज़र आये। इसीलिए कहते हैं कि व्यक्ति चाहे छोटी नौकरी करें या बड़ी उसका अपने संस्थान व कार्य के प्रति निष्ठावान व समर्पित होना बहुत ही आवश्यक है । सभी को उसके जीवन से सीख लेनी चाहिए ।
एक साधारण व्यक्ति जो अपनी ग़रीबी को मिटाने शहर आया था , उसे आज सारा काफ़ी हाउस व शहर याद कर रहा था। बहुत ही मिलनसार व मेहनती व्यक्ति था -भागीरथ।
अब ,जब भी कॉफ़ी हाउस में जाएँगे तो निगाहें भागीरथ को ढूंढ़ेगी ।चालिस वर्ष पूर्व एक अबोध बालक शिमला नौकरी की खोज में आया ।वर्ष 2026 में वे एक बेमिसाल पहचान छोड़ शिमला की खट्टी-मिठी यादें लेकर शिमला से चंद मील दूर दालड़ा घाट के समीप गाँव बडोग लौट गया । गंगा की अविरल धारा की माफ़िक़,काफ़ी में मिठास तो घुलती रहेगी, लेकिन भागीरथ की काफ़ी रूपी गंगा को टेबल तक सलीके से परोसने की याद मुझे व मेरे जैसे उसके अनेक शुभचिंतकों को ज़रूर आएँगी।
Vinod Bhardwaj
Honouring the Past. Illuminating the Present.